तसव्वुर मैं उनका कुछ यूँ मिज़ाज होता है जिस्म दूर हो कितना भी,दिल करीब होता है महेक जाती है रातें अक्सर ख्वाबों से उसके जब वो तस्वीर से निकल मेरे करीब होता है झुकती आँखों से बयां करती है वो मयकशी मेरे खामोश लबों से इश्क कहाँ बयां होता है Sanjay Kanojiya
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अवध की रूहानी शामें याद नहीं क्या क्या छोड़ आये हैं जिस्म ले आये,कहीं रूह छोड़ आये हैं यादों की शाम हँसी का सावेरा, अमीनाबाद में जलता चिराग छोड़ आये हैं बहुत रौनक है दुनिया पैसों की चमक से, शुकुन तो हम शाम-ऐ-आवध छोड़ आये है जो मिलो तो लौट चलो उन गलियो मै फिर जहां दिल तुम अपना हम अपना छोड़ आये है ज़ायका लफ़्ज़ों का जुबान पे अब तक है वादा किसी से शायद अधूरा छोड़ आये है...